Friday, 17 June 2016
भगवान् ने हमें वो सब कुछ दिया है जिसकी आवश्यकता हैं

भगवान् ने हमें वो सब कुछ दिया है जिसकी आवश्यकता हमें इस मानव जीवन में पड़ती है लेकिन इसके बावजूद भी हमें प्रभु से शिकायत रहती है की प्रभु आपने मेरे साथ ऐसा क्यों किया , आपने मेरे साथ वैसा क्यों किया, आपने मुझे ये क्यों नही दिया, मुझे वो क्यों नही दिया। लेकिन इतना सब कुछ देने के बाद क्या प्रभु ने कभी हमसे शिकायत की है की मैंने जिस कार्य के लिए तुम्हे ये मानव जीवन दिया है क्या तुम वो कार्य कर रहे हो। क्या हम धर्म की राह पर चल रहे हैं, क्या हम धर्म का प्रचार-प्रसार कर रहे नही लेकिन फिर भी प्रभु हमारा कल्याण करने के लिए, हमें दर्शन देने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं पर इससे पहले हमारे मन में प्रभु के लिए सच्ची श्रध्दा और विश्वास होना चाहिए।

उक्त विचार पूज्य महाराज श्री ने अनन्त श्री विभूषित महंत पूज्य श्री नृत्यगोपाल दास जी महाराज के 78वें जन्मदिवस के शुभावसर पर प्रभु श्री राम की पावन जन्म स्थली अयोध्या में आयोजित विशाल श्रीमद् भागवत कथा के विराम दिवस में व्यक्त किए।

महाराज श्री ने कहा ये मानव जीवन हमें बार -बार नहीं मिलता इसका हमें दुरूपयोग नहीं अपितु सदुपयोग करना चाहिए। आज हमारे देश में गंगा ,यमुना ,गाय कुछ भी सुरक्षित नहीं है क्यों ? क्योंकि आज हम अपनी संस्कृति को भूलकर संसार की मोहमाया में लिप्त हो चुके हैं। जिस कार्य के लिए भगवान ने हमें ये मानव जीवन दिया है उससे हम भटक चुके हैं। हमारे देश को आज ऐसे युवाओं की जरुरत है जो अपने धर्म का प्रचार करने में बढ चढ़कर हिस्सा लें और भगवान को भी ऐसे ही लोग प्रिय हैं जो अपने धर्म को बचाने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हों और आज के युवा ही हमारे आने वाले कल का भविष्य हैं।इसलिए हमें अपने साथ अपने बच्चों को भी कथा श्रवण करवाने अवश्य लाना चाहिए।

आज की कथा में पूज्य ठाकुर जी महाराज ने सुदामा चरित्र की कथा सभी भक्तों को विस्तार पूर्वक स्मरण करवाई और कहा आज हमारा कोई भी मित्र सुदामा जैसा नहीं हो सकता। आज की इस दुनिया के हमारे सभी मित्र भोगी और लालची हैं तो हम ऐसे मित्रों को क्यों अपना बनाये जो हमें धर्म से अधर्म की ओर ले जाएँ ,सभ्य रास्ते पर ले जाने की बजाय असभ्य रास्ते की ओर ले जाएँ। इसलिए हमें दुनिया के लोगों को अपना मित्र बनाने की बजाय सर्वेश्वर श्री कृष्ण भगवान को अपना बनाना चाहिए। अंत में कथा के मुख्य यजमान के साथ सभी भक्तों ने भागवत जी की विदाई की और विदाई में सभी ने अपनी बुराइयाँ भागवत जी पर समर्पित कर आगे से धर्म के रास्ते पर चलने की कसम खाई।

आज कथा में पधारे पूज्य श्री सतुआ बाबा(संतोषदास जी) महाराज, पूज्य श्री फूलडोल दास जी महाराज एवं नीलकंठ कल्याण दास जी महाराज आदि संत महात्माओं ने कथा में पधारकर उपस्थित सभी श्रद्धालु भक्तों को अपने आशीर्वचन दिए।
Thursday, 16 June 2016
जिन्होंने प्रभु का नाम धन इकट्ठा कर रखा है वे निश्चित ही हँसते-हँसते जायेंगे

संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य यह है की हम खुद अपने हाथों से अपनों को शमशान में जलाकर आते हैं और खुद ऐसे जीते हैं जैसे हम कभी मरेंगे ही नहीं। मृत्यु जीवन का कटु सत्य है एक दिन मरना सब को है। लेकिन कोई हँसते-हँसते मरेगा तो कोई रोते-रोते मरेगा परंतु जो प्रभु के भक्त हैं जिन्होंने प्रभु का नाम धन इकट्ठा कर रखा है वे निश्चित ही हँसते-हँसते जायेंगे। उनके सतकर्म उनको हंसने पर मजबूर कर देंगे। ये भागवत कथा हमें इन्ही सब बातों का बोध कराती है और जब हमारे करोड़ों-करोड़ों जन्मों के पुण्य उदय होते हैं तब हमें ये कथा श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। उक्त विचार पूज्य महाराज श्री ने अनन्त श्री विभूषित महंत पूज्य श्री नृत्यगोपाल दास जी महाराज के 78वें जन्मदिवस के शुभावसर पर प्रभु श्री राम की पावन जन्म स्थली अयोध्या में आयोजित विशाल श्रीमद् भागवत कथा के छठवें दिवस में व्यक्त किए।

आज महाराज श्री ने प्रभु के महारास प्रसंग को प्रारंभ करते हुए कहा की आज की युवा पीढ़ी कहती है कि हमारे प्रभु भी रास करते थे तो हमारे रास रचाने में क्या बुराई है। अरे कलयुग के नौजवानों क्या तुम यह नहीं जानते की प्रभु ने रास में कामदेव को हराया था लेकिन तुम्हारे रास में कामदेव की जीत होती है,वासना हावी होती है लेकिन भगवान का रास वासना मुक्त होता है। प्रभु के रास पर संदेह करने से पहले हमें रास को समझना होगा। रास का अभिप्राय है आत्मा और परमात्मा का मिलन न की शारीरिक मिलन। भगवान की लीलाओं को समझने के लिए पहले हमें भगवान को समझना होगा। प्रभु ने कामदेव के अभिमान को तोड़ने के लिए रास रचाया था।

आज कृष्ण-रुक्मणि विवाहोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया गया। कथा के मुख्य यजमान ने सह-पत्नी कन्यादान की रश्म पूरी की और महाराज जी से आशीर्वाद प्राप्त किया। कल कथा का विराम दिवस है।
॥ राधे - राधे ॥ बोलना पड़ेगा - और प्रेम से बोलना पड़ेगा
॥ राधे - राधे ॥ बोलना पड़ेगा - और प्रेम से बोलना पड़ेगा
निर्जला एकादशी के दिन गोदान का विशेष महत्त्व

निर्जला एकादशी के दिन गोदान काविशेष महत्त्व है।
निर्जला एकादशी व्रत करने वाले व्यक्ति को एक दिन पहले यानि दशमी के दिन से ही नियमों का पालन करना चाहिए। एकादशी के दिन "ॐ नमो वासुदेवाय" मंत्र का जाप करना चाहिए। निर्जला एकादशी के दिन दान-पुण्य और गंगा स्नान का विशेष महत्त्व होता है । अगर व्यक्ति एकादशी को सूर्य उदय से लेकर द्वादशी के सूर्य उदय तक जल ग्रहण न करे तो उसे सारी एकदहियों का फल प्राप्त होता है। द्वादशी को सूर्य उदय से पहले उठकर स्नान आदि करके ब्राह्मणों को दान आदि देना चाहिए। इसके पश्चात् भूखे और सत्पात्र ब्राह्मण को भोजन कराकर फिर आप भोजन कर लेना चाहिए। इसका फल पुरे एक वर्ष की सम्पूर्ण एकादशियों के बराबर होता है।
व्यास जी कहते हैं हे भीमसेन यह मुझको स्वयं भगवान् ने बताया है। इस एकादशी का पुण्य समस्त तीर्थों व दानो से अधिक है। केवल एक दिन मनुष्य निर्जला रहने से पापों से मुक्त हो जाता है। जो व्यक्ति निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं उन्हें मृत्यु के समय यम के दूत आकर नहीं घेरते बल्कि उन्हें भगवान् के पार्षद पुष्पक विमान में बैठाकर स्वर्ग ले जाते हैं। अतः संसार में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी का व्रत है।
॥ राधे - राधे ॥ बोलना पड़ेगा - और प्रेम से बोलना पड़ेगा
Wednesday, 15 June 2016
Virat Sant Sammelan 17/18 June 2016

अनन्त श्री विभूषित पूज्य श्री नृत्य गोपाल दास जी महाराज के 78 वें जनोमत्सव के उपलक्ष्य में अयोध्या में आयोजित संत सम्मलेन 17-18 June 2016 लाइव अयोध्या से
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